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अध्याय-2.4 : भारत के विदेश संबंध
भारत-चीन संबंध
भारत चीन संबंधों की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परंपरा रही है किन्तु बदलते परिदृश्य में आज भारत-चीन संबंधों में एक खास प्रकृति नजर आती है। आज भारत-चीन प्रतिद्वंदी एवं सहयोगी दोनों हैं। जहाँ एक तरफ राजनीतिक एवं सामरिक प्रतिद्वंदिता है वहीँ दूसरी ओर सामाजिक एवं आर्थिक सहयोग भी है। राजनीतिक एवं सामरिक संबंधों के तहत चीन एशिया में भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है, जिसे उसकी ‘मोतियों की माला नीति’ कहा जा रहा है। इसके साथ ही साथ वह भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार भी है।
भारत-चीन संबंधो में उतार-चढाव
सन् 1949 में जब साम्यवादी चीन का उदय होता है तो गैर साम्यवादी देशों में सबसे पहले भारत ने उसे मान्यता दी जिससे भारत चीन संबंधों के प्रारंभिक चरण में मित्रता के दौर दिखाई दिये। जब चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया तब भारत ने उसका विरोध नहीं किया बल्कि 1954 में भारत चीन के मध्य पंचशील समझौता हुआ तथा तिब्बत पर चीन के अधिकार को स्वीकार कर लिया गया। लेकिन 1959 में जब चीन ने तिब्बतवाशियो पर दमन चक्र प्रारम्भ किया तो दलाईलामा के नेतृत्व में हजारों शरणार्थी भारत में शरण लिए। जिससे चीन नाराज हो गया और भारत तथा चीन के मध्य आरोप-प्रत्यारोप का दौर प्रारम्भ हो गया। इसी समय चीन भारतीय सीमाओ का अतिक्रमण करने लगा तथा 20 अगस्त 1962 को भारत पर आक्रमण कर दिया। चूंकि भारतीय सेना इस अप्रत्याशित आक्रमण से निपटने के लिये तैयार नहीं थी इसलिये पराजय का मुह देखना पड़ा। इस आक्रमण के समय चीन ने भारत की लगभग 38000 वर्ग कि.मी जमींन पर कब्ज़ा कर लिया जो आज भी उसके कब्जे में है। इस घटना के बाद से ही हमारे रिश्तों में तनाव के दौर प्रारम्भ हो गए, जो आज तक बरकरार है।
सन् 1962 के बाद भारत-चीन राजनयिक सम्बन्ध समाप्त हो गए थे। इसी समय 1964 में चीन अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिसके बाद भारत ने अपनी परमाणु निति पर पुनर्विचार करके परमाणु परीक्षण करने की तैयारी शुरू कर दी। ध्यातव्य है कि भारत की परमाणु निति नेहरू काल में शांतिपूर्ण कार्यो तक ही सिमित थी। सन् 1974 में श्रीमती गांधी के कार्यकाल में भारत ने अपना प्रथम परमाणु परिक्षण पोखरण-1 किया। जिससे दोनों देशों के बीच प्रतिद्वंदिता और बढ़ गयी।
अब चीन भारत के परम् प्रतिद्वंदी पाकिस्तान की सैन्य साज-सामानों से मदद करने लगा जिससे दोनों देशों के रिश्ते सुधर नहीं सकते थे। लेकिन श्रीमती गाँधी के प्रयासों से सन्1976 में पुनः राजनयिक संबंधों की बहाली होती हैं। जब भारत में जनतापार्टी की सरकार बनती है तो विदेश मंत्री श्री वाजपेयी की चीन यात्रा होती है। रिश्तों के सुधार की दिशा में कुछ सकारात्मक बात होती लेकिन इसी समय चीन द्वारा वियतनाम पर आक्रमण किये जाने के कारण वाजपेयी जी राजनयिक यात्रा पूर्ण होने के पहले ही लौट आये। लेकिन जब भारत में श्री राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बनते हैं तो रिश्तो में थोड़ा सुधार होता है तथा सन् 1988 की श्री राजीव गांधी की चीन यात्रा इस दिशा में ऐतिहासिक माना जाता है। सन् 1993 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव की चीन यात्रा होती है। इस समय एक ऐतिहासिक समझौता होता है जिसके तहत राजनीतिक एवं सामरिक मुद्दों को अलग रख कर आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में रिश्तों को सुधारने की बात की जाती है। जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक सम्बन्ध सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ते हैं।
अब धीरे-धीरे पाकिस्तान की तरफ से चीन का मोह थोड़ा कम होने लगा। इसीलिए जब 1999 में कारगिल पर पाकिस्तानी घुसपैठिए अधिकार कर लिया थे तो चीन ने पाकिस्तान पर कारगिल को खाली करने का दबाव डाला, जिसे भारत की कूटनीतिक विजय माना गया। इसीलिए भारतीय प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी जी ने 2003 में चीन की यात्रा की। इसी समय सर्वप्रथम चीन ने सिक्किम को भारत का अभिन्न हिस्सा स्वीकार किया तथा सिक्किम के नाथुला दर्रा को खोलने से सम्बंधित समझौता हुआ हलाकि यह दर्रा 2006 में खोला गया।
भारत एवं चीन के सुधरते रिश्तों के कारण सन् 2007 से भारत और चीन के मध्य संयुक्त सैन्याभ्यास ‘हैण्ड इन हैण्ड’ आयोजित किया जाने लगा लेकिन सन् 2009 में जब चीन ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा (विवादित क्षेत्र के निवासी मानकर) जारी किया तो यह युद्धाभ्यास रोक दिया गया। परन्तु 2013 से इस प्रकार का सैन्याभ्यास पुनः प्रारम्भ किया गया।
दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सुधारने हेतु सन् 2013 में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन यात्रा होती है जिस दौरान 9 महत्वपूर्ण बिन्दुओ पर सहयोग समझौता हुआ। लेकिन रिश्तों के सुधार की दिशा में महत्व पूर्ण कदम चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग की भारत यात्रा 2014 तथा भारतीय प्रधानमंत्री मोदीजी की चीन यात्रा 2015 को माना जा सकता है। दोनों ही नेता अपने गृह शहर में एक दूसरे का प्रोटोकॉल तोड़कर स्वागत करते हैं। मोदीजी की यात्रा शियान प्रान्त से प्रारम्भ होती है। जिसका ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक व्यापार विज्ञान टेक्नोलॉजी तथा संस्कृति के क्षेत्र में कुल 24 समझौते हुए। रेलवे खान खनिज अंतरिक्ष पर्यटन व्यापार व्यवसायिक शिक्षा तथा कौशल विकास के क्षेत्र में सहयोग की बात कही गयी। भारत और चीन के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने हेतु दोनों देशों के सैन्य प्रमुखों के मध्य हॉट लाइन शुरू करने पर सहमति बनी।
वर्तमान परिदृश्य
धारा-370 तथा कश्मीर के मुद्दे पर चीन लगातार पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखाई दिया लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को मिल रहे व्यापक समर्थन के कारण आखिरकार चीन को बैकफुट होना पड़ा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 2 दिवसीय भारत यात्रा के पूर्व चीन ने यह बयान जारी किया कि कश्मीर मामले को दोनों देश आपसी बातचीत से सुलझाएं।लेकिन अगले ही दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को यह भी आश्वासन दिए कि वे कश्मीर के मामले पर नजर रखे हुए हैं, पाकिस्तान को चिंता की आवश्यकता नहीं है।चीन के इस प्रकार के बयान का मतलब यही है कि वह सदैव पाकिस्तान के माध्यम से भारत पर दबाव बनाने का प्रयास करता रहता है।जब शी जिनपिंग भारत की यात्रा पर आते है,हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी से वार्ता होती है तो ऐसा लगता है कि दोनों देशों के बीच संबंधों के एक नए दौर की शुरूआत होगी अब।लेकिन सारी उम्मीदों पर पानी तब फिर जाता है जब चीनी सेना गलवान घाटी क्षेत्र में भारतीय सीमा पर घुसपैठ और नवनिर्माण की कोशिश करती है और जिसे रोकने पर हमारे सैनिकों के साथ खूनी झड़प होती है जिससे हमारे 16 जवान शहीद हो जाते हैं।इस घटना क्रम से दोनों देशों के बीच 1962 जैसा तनाव उत्पन्न हो गया है।दोनों देशों की सेनाएं सीमा पर आमने-सामने हैं। हलाकि बातचीत का दौर भी चल रहा है आशा की जा रही है कि कोई हल अवश्य निकल आएगा।
विवाद के प्रमुख बिंदु
1- सीमा विवाद
जिन कारणों से भारत चीन सम्बन्ध सबसे ज्यादा प्रभावित है उनमे सीमा विवाद सबसे महत्वपूर्ण है। भारत-चीन युद्ध 1962 के दौरान चीन भारत के लगभग 38 हजार वर्ग कि.मी भू-भाग पर कब्जा कर लिया था जो आज भी उसी के कब्जे में है। पाक अधिकृत कश्मीर का लगभग 5 हजार वर्ग कि.मी भू-भाग पाकिस्तान चीन को दे रखा है जिस पर चीन एक राजमार्ग बना लिया है जो भारत के सामरिक हितों के प्रतिकूल है।
2- जल विवाद
ब्रह्मपुत्र नदी उदगम के पश्चात् पहले चीन में प्रवाहित होती है। उसके पश्चात अरुणांचल प्रदेश से भारत में प्रवेश करती है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बाँध बनाकर उसके मार्ग में परिवर्तन करना चाहता है। जिस पर भारत लगातार अपनी आपत्ति जताता रहा है।
3- चीन द्वारा पाकिस्तान की मदद
चीन लगातार सैन्य साज-सामानों से भारत के परम प्रतिद्वंदी पाकिस्तान की मदद करता रहा है जो भारत -चीन संबंधो में खटास का प्रमुख कारण रहा है। चीन पाकिस्तान में न्यूक्लियर रिएक्टर स्थापित कर रहा है इसके साथ ही साथ अरब सागर मे पाकिस्तान के बंदरगाह ग्वादर को विकसित कर रहा है तथा ग्वादर को चीन के उरुमची से जोड़ने वाला 46 अरब डॉलर का गलियारा बना रहा है। जो भारत के सामरिक हितों के प्रतिकूल है। हालाकि चीन की यह नीति पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाना नहीं है बल्कि भारत के ऊपर दबाव बनाने की नीति है।चीन लगातार सैन्य साज-सामानों से भारत के परम प्रतिद्वंदी पाकिस्तान की मदद करता रहा है जो भारत -चीन संबंधो में खटास का प्रमुख कारण रहा है। चीन पाकिस्तान में न्यूक्लियर रिएक्टर स्थापित कर रहा है इसके साथ ही साथ अरब सागर मे पाकिस्तान के बंदरगाह ग्वादर को विकसित कर रहा है तथा ग्वादर को चीन के उरुमची से जोड़ने वाला 46 अरब डॉलर का गलियारा बना रहा है। जो भारत के सामरिक हितों के प्रतिकूल है। हालाकि चीन की यह नीति पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाना नहीं है बल्कि भारत के ऊपर दबाव बनाने की नीति है।
4-चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा
एशिया में प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा के कारण चीन भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानता है। अतः वह नहीं चाहता की भारत को क्षेत्रीय शक्ति का दर्जा प्राप्त हो इसी लिये वह भारत की सयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिसद में स्थायी सदस्यता का समर्थन नहीं करता।एशिया में प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा के कारण चीन भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानता है। अतः वह नहीं चाहता की भारत को क्षेत्रीय शक्ति का दर्जा प्राप्त हो इसी लिये वह भारत की सयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिसद में स्थायी सदस्यता का समर्थन नहीं करता।
5-चीन की मोतियो की माला की निति
चीन की यह लगातार नीति रही है की वह हिन्द महासागर में भारत के प्रसार को सिमित कर दे तथा अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा कर सके। इसलिए उसने भारत को घेरने के लिए ‘मोतियो की माला की निति’ अपनायी है। जिसके तहत वह भारत के पड़ोसी देशों में नौ सैनिक बेस बना रहा है। अपनी इसी महत्वकांक्षी योजना के तहत म्यांमार के सितवे बन्दरगाह, बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह, श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह, मालदीव के मराओ द्वीपीय बंदरगाह एवं पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर को अपने सामरिक हितों के अनुकूल विकसित कर रहा है। चीन की यह लगातार नीति रही है की वह हिन्द महासागर में भारत के प्रसार को सिमित कर दे तथा अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा कर सके। इसलिए उसने भारत को घेरने के लिए ‘मोतियो की माला की निति’ अपनायी है। जिसके तहत वह भारत के पड़ोसी देशों में नौ सैनिक बेस बना रहा है। अपनी इसी महत्वकांक्षी योजना के तहत म्यांमार के सितवे बन्दरगाह, बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह, श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह, मालदीव के मराओ द्वीपीय बंदरगाह एवं पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर को अपने सामरिक हितों के अनुकूल विकसित कर रहा है।
6- अमेरिका फैक्टर
चूंकी चीन अमेरिका को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है और अमेरिका भी चीन पर नियंत्रण रखने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए लगातार भारत से अपने संबंधों को सुधार रहा है अतः भारत को लेकर चीन चिंतित है।चूंकी चीन अमेरिका को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है और अमेरिका भी चीन पर नियंत्रण रखने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए लगातार भारत से अपने संबंधों को सुधार रहा है अतः भारत को लेकर चीन चिंतित है।
सहयोग के प्रमुख बिंदु
1- चीन हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। आज हमारे देश का लगभग 84 अरब डालर का व्यापार चीन के साथ है। हलाकि भुगतान संतुलन चीन के पक्ष में है जिसकी कुछ विशेषज्ञ आलोचना करते हैं। फिर भी दोनों देशों के बीच सहयोग का यह प्रमुख बिंदु है।
2- ब्रिक्स दोनों देशों का साझा मंच है जिसके माध्यम से दोनों देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
3- चीनी छात्र इंग्लिश एवं कम्प्यूटर की शिक्षा प्राप्त करने के लिये भारत आते हैं।
4- भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन यात्रा 2013 के समय सिस्टर सिटी समझौता हुआ। जिसके तहत कलकत्ता-कुंसिंग, बेंगलुरु-चेंगदू तथा दिल्ली-बीजिंग को सिस्टर सिटी घोषित किया गया तथा इनके विकास हेतु परस्पर सहयोग का आस्वासन दिया गया। इसी प्रकार का समझौता प्रधानमंत्री मोदीजी की यात्रा के समय भी हुआ।
संबंधों में सुधार हेतु सुझाव
1- चीन को भारत का वह भूभाग वापस कर देना चाहिए जो 1962 के युद्ध में हड़पा था तथा नियंत्रण रेखा का सम्मान करना चाहिए।
2- भारत के बिरुद्ध पाकिस्तान की मदद करने से चीन को बाज आना चाहिए।
3- सयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिसद में भारत की स्थाई सदस्यता का चीन को समर्थन करना चाहिए।
4- चीन को इसलिए भी भारत की मदद करनी चाहिये क्योंकि भारत के शक्तिशाली होने पर बाहरी शक्तियो का एशिया में प्रवेश रुक जायेगा जो भारत की तुलना में चीन के लिये ज्यादा लाभप्रद होगा।
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भारत-पाकिस्तान संबंध
सन् 1947 के पूर्व पाकिस्तान भारत का ही हिस्सा था पर देश की आजादी के साथ भारत का विभाजन भी हो गया तथा विभाजन के कारण उत्पन्न समस्याओं से ही दोनों देशों में शत्रुता भी प्रारम्भ हो गया।अब तक दोनों देशों के मध्य छोटे-बड़े कुल चार युद्ध हो चुके हैं लेकिन लेकिन सभी समस्याएं पूर्वत बनी हुयी हैं।
शत्रुता का उदभव व विकास
15 अगस्त 1947 तक सभी देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में विलय हो चुकी थी लेकिन तीन रियासतें अभी भी स्वतन्त्र थी।इन रियासतों के विलय में सबसे बड़ा अड़पेच कश्मीर को लेकर था क्योंकि कश्मीर के डोगरा राजा हरि सिंह न तो इसे पाकिस्तान में विलय करना चाहते थे और न ही भारत में विलय।भारत इस मामले में चुप था लेकिन पाकिस्तान कश्मीर को हर हाल में पाना चाहता था इसलिए पहले तो उसने कश्मीर पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिया क्योंकि उस समय कश्मीर का ज्यादातर व्यापार पाकिस्तान से ही होता था जो की भौगोलिक रूप से सुविधाजनक था लेकिन इस प्रतिबन्ध का राजा हरिसिंह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ते देख पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबायली (किराये के आदिवासी सैनिक) आक्रमण करा दिया।कबायलियों ने कश्मीर में कत्लेआम शुरू कर दिए ।कश्मीर की सुरक्षा के लिए राजा हरिसिंह ने भारत से सहायता मांगी।भारतीय नेता नेहरू और पटेल सहायता देने के पक्ष में थे लेकिन गवर्नर जनरल माउन्टबेटन अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का हवाला देकर यह कहा की जब तक कश्मीर का भारत में विलय नहीं हो जाता तब तक हम कश्मीर की सहायता नहीं कर सकते अतः मजबूर होकर कश्मीर के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ अक्सेशन(विलय पत्र)पर हस्ताक्षर कर दिए।अतः शीघ्र ही भारतीय सेना हवाई मार्ग से कश्मीर भेजी गयी।भारतीय सेना को कश्मीर से कबायलियों को पीछे भगाने में सफलता मिल रही थी । कुछ और दिनों में भारतीय सेना कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे से पूर्णतया मुक्त करा पाती लेकिन इसी समय नेहरू जी मामले को यू एन ओ में ले गए । यू एन ओ मामले में हस्तक्षेप करके युद्ध विराम समझौता करा दिया।उस समय जितना भूभाग पाकिस्तान के कब्जे में था आजतक पाकिस्तान के कब्जे में बना हुआ है जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है तथा भारत पाक अधिकृत कश्मीर।
हलाकि इस मामले को सुलझाने के लिए UNO ने एक आयोग का गठन किया था जिसकी रिपोर्ट में यह प्रस्ताव था की पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेना को वापस ले तो वहाँ जनमत संग्रह कराया जायेगा लेकिन पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर से सेना वापस लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उसको इस बात का भय था की शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में बहुसंख्यक मुस्लिम भारत के पक्ष में मत व्यक्त करेंगे जिससे उसकी पराजय निश्चित थी।
अतः पाकिस्तान की हठधर्मिता के कारण कश्मीर समस्या आज तक बनी हुयी है जो भारत-पाक संबंधों में खटास का प्रमुख कारण है।
कश्मीर के सम्बन्ध में पाकिस्तान के तर्क
1- चूँकि भारत का विभाजन द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुआ था अतः मुस्लिम बहुल कश्मीर पर पाकिस्तान का हक़ है।इसी आधार पर भारत ने जूनागढ़ व हैदराबाद का बल पूर्वक विलय किया था।
2- भौगोलिक रूप से कश्मीर पाकिस्तान के ज्यादा करीब है।स्वतंत्रता से पूर्व कश्मीर का ज्यादातर व्यापार पाकिस्तान वाले क्षेत्र से ही होता था।
3- बिना जनमत संग्रह के कश्मीर का भारत में विलय अवैध है।
4- कश्मीरी जनता आज भी भारत से आजाद होना चाहती है।वह भारतीय झंडे के नीचे नहीं रहना चाहती है।
भारत के तर्क
1- कश्मीर का भारत में विलय पूर्णतया वैधानिक है ।भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में यह प्रावधान था कि किस रियासत को किसके साथ सामिल होना है यह रियासत के शासक को निर्णय लेना था और जब राजा हरीसिंह ने कश्मीर का भारत में विलय कर दिया है तो अब पाकिस्तान का कोई भी तर्क बेबुनियाद है।
2- द्वि-राष्ट्र का सिद्धांत पाकिस्तान की अपनी बुद्धि की उपज है जिसे शासक मानने के लिए बाध्य नहीं होते।
3- जनमत संग्रह की पूर्व शर्त थी की पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेना वापस ले।जब उसने पहली शर्त मानने से इंकार कर दिया तो अब जनमत संग्रह का राग अलापने का कोई औचित्य नहीं है।
4- जम्मू कश्मीर की निर्वाचित संविधान सभा ने विधिवत प्रस्ताव पारित करके कश्मीर के भारत में विलय को स्वीकार कर लिया है तथा कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया है।
कश्मीर समस्या के सन्दर्भ में भारत द्वारा की गयी गलतियाँ
1- नेहरू द्वारा जनमत संग्रह की बात स्वीकार करना एक बड़ी भूल थी क्योंकि न तो राजा हरिसिंह ऐसी कोई शर्त रखी थी और न ही जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला ने ही ऐसी कोई माँग की थी।
2- मामले को UNO में भारत को नहीं ले जाना चाहिए था क्योंकि भारतीय सेना उस समय आगे बढ़ रही थी तथा पाक सेना बैक फुट पर थी।कुछ दिनों में पुरे कश्मीर में मेरा कब्ज़ा हो जाता।
3- भारत ने इस मामले को UN सुरक्षा परिषद में चार्टर के गलत अनुच्छेद के तहत उठाया।मामले को चार्टर के अध्याय 7 के अनु. 39 के तहत उठाना चाहिए था जो शांति के उल्लंघन और आक्रमण की कारवाही से सम्बंधित है।यदि ऐसा होता तो पाकिस्तान को आक्रमणकारी घोषित किया जाता परन्तु भारत ने मामले को अध्याय 6 के अनु.35 के तहत उठाया जो विवादों के शांति पूर्ण निपटारे से सम्बंधित है।ऐसा करके भारत स्वयं विश्व को यह सन्देश दिया की मामला विवादित है।
4- भारत को युद्ध विराम समझौता तभी करना चाहिए था जब पुरे कश्मीर पर भारतीय सेना का कब्जा हो जाता क्योंकि उस समय भारतीय सेना जीत के करीब थी।
भारत और पाकिस्तान के मध्य विवाद के महत्वपूर्ण बिंदु
1- पाक समर्थित आतंकवाद- भारत-पाक युद्ध 1965 तथा 1971 द्वारा यह साबित हो गया की आमने-सामने के युद्ध में भारत को पराजित नहीं किया जा सकता तो पाकिस्तान ने छदम् युद्ध(proxy war) का सहारा लिया, जिसका एक रूप आतंकवाद है।दोनों देशों के रिश्ते सामान्य नहीं हो पा रहे हैं इसका मुख्य कारण अतंकवाद है।अभी हाल ही में जब वार्ता का दौर प्रारम्भ हो ही रहा था की पठानकोट आतंकी हमला हो गया जिससे वार्ता को कुछ दिन के लिए टाल दिया गया है।
2- नदी जल विवाद- पाकिस्तान में प्रवाहित नदियां सिंधु झेलम चनाव रावी सतलज व्यास उदगम् के बाद पहले भारत में प्रवाहित होती हैं फिर पाकिस्तान में अतः पानी के बटवारे को लेकर विवाद प्रारम्भ से ही था लेकिन विश्व बैंक की मध्यस्थता से1960 में सिंधु और उसकी सहायक नदियों के जल बटवारे से सम्बंधित समझौता हुआ।जिसके तहत सिंधु झेलम चेनाव के जल का आधे से अधिक भाग पर पाकिस्तान का घोषित किया गया जबकि रावी सतलज व्यास पर इसीप्रकार भारत के अधिकार को स्वीकार किया गया।लेकिन भारत जब भी सिंधु झेलम चेनाव पर कोई परियोजना स्थापित करने लगता है तो पाकिस्तान हाय तोबा मचाता है।ऐसी ही परियोजनाओं में किशनगंगा परियोजना,बगलिहार परियोजना,तुलबुल परियोजना तथा बुंजी परियोजना हैं।
3- सियाचिन विवाद- सियाचिन उत्तरी कश्मीर में स्थित ग्लेशियर है जिसे कश्मीर अपना बतलाता है तथा बीच-बीच में अपने पर्वतारोही और सैनिक भेजता रहता है जिससे बीच-बीच में झड़पें होती रहती हैं इससे निपटने के लिए भारतीय सेना यहाँ ऑपरेशन मेघदूत चला रही है।यह विश्व का सबसे ऊँचा युद्ध स्थल माना जाता है।
4- सर क्रिक विवाद- भारत के पश्चिमी गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रान्त का तटवर्ती दलदली उथला समुद्री क्षेत्र के बटवारे को लेकर विवाद है।चूँकि इस क्षेत्र का बटवारा सर क्रिक नामक अंग्रेज अधिकारी के नेतृत्व में हुआ था इस लिए इसे सर क्रिक विवाद कहा जाता है।चूँकि इस क्षेत्र में प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम के भण्डार होने की संभावना है इस लिए दोनों ही देश इस पर अपना दावा प्रस्तुत करते रहते हैं।सन् 1965 में इस मुद्दे को लेकर युद्ध भी हो चूका है लेकिन आजतक कोई समाधान नहीं निकाला जा सका है।
5- पाकिस्तान-चीन की नजदीकियां- पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर का लगभग 5000 वर्ग कि मी भाग चीन को दे रखा है जिसे अक्साई चिन कहा जाता है।यह क्षेत्र सामरिक महत्त्व का है जो भारत के सुरक्षा हितों के प्रतिकूल है।चीन इस क्षेत्र से कराकोरम राजमार्ग बना लिया है जिसके माध्यम से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोड़ने वाला गलियारा बना कर अरब सागर में अपनी उपस्थिति दर्ज करना चाहता है जोकि भारत के सामरिक हितों के प्रतिकूल है।
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भारत की परमाणु नीति
अमेरिका द्वारा प्रथम परमाणु परीक्षण न्यू मैक्सिको की मरुभूमि में जुलाई 1945 में किया गया था तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में परमाणु बम नामक महादानवी अस्त्र का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया।अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत मे जापान के दो नगरों हिरोशिमा व नागासाकी पर क्रमशः 6 अगस्त और 9 अगस्त 1945 को परमाणु बम गिराने का निर्णय लेकर परमाणु युद्ध का श्रीगणेश किया गया।इसके बाद रूस इंग्लैंड और फ्रांस भी परमाणु शक्ति सम्पन्न बनने के लिए प्रयास तेज कर दिए।इसमें सर्वप्रथम 1949 में सोवियत रूस को सफलता मिली।इसके बाद 1952 में में ब्रिटेन,1960 में फ्रांस तथा 1964 में चीन ने भी यह क्षमता अर्जित कर ली।
चीन के परमाणु शक्ति सम्पन्न होते ही भारत ने भी इस ओर प्रयास तेज कर दिए तथा 18 मई 1974 को अपना पहला परमाणु परीक्षण पोखरन-1 किया। इसके 24 साल बाद 11 मई व 13 मई 1998 में पोखरन-2 के तहत अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया।
अब सवाल यह पैदा होता है कि जब भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न हो गया है तो उसकी कोई न कोई परमाणु नीति होनी चाहिए, आखिर भारत इस दानवी शिशु को क्यों पाल रहा है?
परमाणु नीति का विकास
सन 1948 में भारतीय संसद ने परमाणु शक्ति में छिपी संभावनाओं को समझते हुए परमाणु शक्ति अधिनियम पारित किया गया और परमाणु ऊर्जा विभाग की स्थापना की।
नेहरूजी ने यह स्पष्ट किया कि भारत परमाणु ऊर्जा को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए विकसित करेगा। इसी प्रकार 1955 में डॉ होमी जहांगीर भाभा ने जेनेवा में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के औद्योगिक तकनीकी और आर्थिक विकास के लिए परमाणु ऊर्जा का शान्ति पूर्ण प्रयोग काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस तरह 1947 से 1964 तक भारत का मानना था कि परमाणु हथियारों का परीक्षण भी उसके प्रयोग से कम खतरनाक नही है।यही वजह है कि भारत ने आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (PTBT) पर हस्ताक्षर किए।अर्थात भारत की आरंभिक परमाणु नीति शांतिपूर्ण और विकास की अवधारणा पर आधारित थी।
लेकिन 1962 में चीन द्वारा मिली अपमान जनक पराजय और 1964 में चीन के परमाणु शक्ति सम्पन्न बनने के बाद भारत सरकार के ऊपर इस बात का दबाव बढ़ने लगा कि हमें भी परमाणु हथियार बनाना चाहिए।अतः तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने परमाणु परीक्षण को आवश्यक बताते हुए इसके विकास की अनुमति दे दी। इस प्रकार अब भारत की परमाणु नीति सामरिक सुरक्षा से युक्त हो गयी और भारत ने 18 मई 1974 में पोखरन में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया।परीक्षण के बाद भी भारत ने यह घोषित किया कि वह शांतिपूर्ण कार्यो के लिए परमाणु शक्ति के विकास कार्यक्रम को प्राथमिकता देगा।
भारत की परमाणु नीति के प्रमुख विंदु
1- भारत किसी भी राष्ट्र पर पहले परमाणु हथियारों का प्रयोग नही करेगा।
2- भारत गैर परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र पर परमाणु हथियारों का प्रयोग नही करेगा।
3- भारत अपनी परमाणु क्षमता का विकास राष्ट्र की सुरक्षा और शांतिपूर्ण कार्यो के लिए करेगा।
4- भारत न्यूनतम भरोसेमंद परमाणु क्षमता को अर्जित करने का प्रयास करेगा। लेकिन यह न्यूनतम भरोसेमंद क्षमता प्रतिरोधी राष्ट्र की क्षमता के सापेक्ष है।
5- भारत आगे अब कोई परीक्षण नही करेगा।
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"विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।" 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनायी गयी विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। (NCERT)
यह बात सत्य है कि विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है। जब भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ तो उसके सामने देश के पुनर्निर्माण और विकास की चुनौती थी और इस चुनौती को पूरा करने के लिए हमें शांति और आर्थिक सहायता की जरूरत थी।चूंकि उस समय पूरा विश्व शीत युद्ध और गुटबंदी के दौर से गुजर रहा था। यदि भारत किसी एक गुट में सम्मिलित होता तो शीत युद्ध की लपटें भारत तक पहुंच जाती तथा भारत की शांतिपूर्ण विकास की इच्छा अधूरी रह जाती। इसी प्रकार यदि भारत दोनों गुटों में से किसी एक गुट में सम्मिलित हो जाता तो दूसरे गुट से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता से वंचित रह जाता और देश के पुनर्निर्माण और विकास का कार्यक्रम प्रभावित होता। इसीलिए भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनी विदेश नीति का मुख्य आधार बनाया।
भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की ही सफलता है कि हम भारत-चीन युद्ध 1962 व खाद्यान्न संकट 1965-66 के समय अमेरिका से सहायता प्राप्त कर सके। वहीं जब भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 में अमेरिका पाकिस्तान के साथ था तो हम रूस से सहायता प्राप्त कर सके। अर्थात हम दोनों ही गुटों से अपनी घरेलू जरूरतों के अनुसार सहायता प्राप्त कर सके।
लेकिन अब जब पूरा देश एक ध्रुवीय हो गया है और भारत की घरेलू जरूरतें (रक्षा तकनीकी व परमाणु ऊर्जा) अमेरिका से पूरी होती दिख रही हैं तो भारत अमेरिका से लगातार नजदीकियां बढ़ा रहा है।
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किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत की विदेश नीति के उदाहरण देते हुए इस प्रश्न पर विचार कीजिए।(NCERT)
किसी राष्ट्र की विदेश नीति पर उसके राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव अवश्य पड़ता है।यह बात भारत के लिए भी सत्य है।क्योंकि भारत में भी सरकार बदलने पर या प्रधानमंत्री बदलने पर भारत की विदेश नीति प्रभावित हुई है।प्रारंभिक दौर में नेहरू जी के प्रभाव के कारण हमारी विदेश नीति में आदर्शवादी प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है।वहीं लालबहादुर शास्त्री व इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारतीय विदेश नीति में यथार्थवादी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।इसी प्रकार प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के कार्यकाल में भारत की विदेश नीति पर उदारवादी प्रभाव दिखता है जिसे विशेषज्ञ सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी (Soft Power Diplomacy) की संज्ञा देते हैं।वर्तमान प्रधानमंत्री मोदीजी की विदेश नीति में अटलजी के सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी का स्थान हार्ड पॉवर डिप्लोमेसी ने ले लिया है। सर्जिकल स्ट्राइक,एयर स्ट्राइक,डिजिटल स्ट्राइक और इजरायल व अमेरिका से संबंध मजबूत करना इसी प्रकार की डिप्लोमेसी का हिस्सा है।
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