अध्याय-1 : शीत युद्ध का दौर
शीत युद्ध का क्या अर्थ है?
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात दो महाशक्तियों का उदय हुआ। अमेरिका और सोवियत संघ । दोनों के मध्य अविश्वास के कारण एक दूसरे के सापेक्ष अपने आपको शक्तिशाली बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई। यह प्रतिस्पर्धा ऐसी स्थिति में प्रवेश कर गई की ऐसा प्रतीत होने लगा कि दोनों ही महाशक्तियों के मध्य कभी भी युद्ध प्रारंभ हो सकता है लेकिन यह वास्तविक युद्ध नहीं था वल्कि एक विचारधारा का युद्ध,मनोवैज्ञानिक युद्ध,प्रयोगशाला में लड़ा जाने वाला युद्ध तथा संचार माध्यमों से एक दूसरे के विरुद्ध विरोधी विचार व्यक्त करने का कूटनीतिक युद्ध माना जा सकता है।
शीतयुद्ध शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी राजनीतिज्ञ बर्नार्ड बारूश ने 16 अप्रैल 1947 को किया था लेकिन इसे लोकप्रिय बनाने का कार्य वाल्टर लिटमैन ने अपनी पुस्तक 'The Cold war' के माध्यम से किया।
शीत युद्ध को परिभाषित कीजिए
डॉक्टर एम एस राजन के अनुसार-
'शीत युद्ध शक्ति संघर्ष की राजनीति का मिलाजुला परिणाम है। दो विरोधी विचारधाराओं और दो परस्पर विरोधी जीवन पद्धतियों में संघर्ष का परिणाम है।'
डी. एफ. फ्लेमिंग के अनुसार -
'शीत युद्ध एक ऐसा युद्ध है जो युद्धक्षेत्र में नहीं बल्कि मनुष्य के मस्तिष्क में लड़ा जाता है।'
गिब्ज के अनुसार -
'यह एक प्रकार का कूटनीतिक युद्ध है जिसमें शत्रु को अकेला करने और मित्रों की खोज करने की चतुराई का प्रयोग किया जाता है।'
शीत युद्ध के क्या
'यह एक प्रकार का कूटनीतिक युद्ध है जिसमें शत्रु को अकेला करने और मित्रों की खोज करने की चतुराई का प्रयोग किया जाता है।'
द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य तनाव व शीतयुद्ध का दौर प्रारम्भ हो गया।आइये जानते हैं इसके क्या कारण थे।
1-दोनों महाशक्तियों में अविश्वास
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ ) के मध्य अविश्वास पैदा हो गया। इस अविश्वास के पीछे कई कारण थे जिसमें प्रमुख कारण निम्न थे-
¡- द्वितीय मोर्चे के प्रश्न पर मतभेद
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब जर्मनी सोवियत संघ पर आक्रमण कर रहा था तो युद्ध की भयंकरता को देखते हुए सोवियत संघ के राष्ट्रपति स्टालिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट तथा ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल से यह आग्रह किए कि जर्मनी के पश्चिमी भाग पर अमेरिका और ब्रिटेन को दूसरा मोर्चा खोल देना चाहिए जिससे जर्मनी की सैनिक शक्ति दो भागों में विभाजित हो जाए और उसे पराजित करना आसान हो जाए लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन ने उनके इस आग्रह पर कोई निर्णय नहीं लिए जिससे पश्चिमी देशों पर सोवियत संघ को अविश्वास हो गया।
¡¡ -परमाणु अस्त्रों पर एकाधिकार
चूंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अमेरिका गुप्त रूप से परमाणु अस्त्रों को विकसित कर लिया था अतः सोवियत संघ भी परमाणु अस्त्र विकसित करने के लिए प्रयास करने लगा जिससे दोनों महा शक्तियों में प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई जो शीत युद्ध का प्रमुख कारण बना।
2-विचारधारा का टकराव
सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा का समर्थक था जबकि अमेरिका ब्रिटेन पूंजीवादी। अतः इनके मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक था इसका एक कारण यह भी था कि सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करके अन्य देशों में भी साम्यवादी शासन की स्थापना हेतु प्रयासरत था जबकि पूंजीवादी देश इस प्रसार को रोकने के लिए प्रयासरत थे। अतः यह टकराव शीतयुद्ध का कारण बना।
3-पूरे विश्व में सैनिक गुटबंदी का दौर
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पूरे विश्व में सैनिक गुटबंदियों का दौर प्रारंभ हो गया। अमेरिका अपने प्रभाव एवं शक्ति को बढ़ाने के लिए नाटो सीटो सेंटो जैसे सैनिक गुटों का निर्माण किया। जबकि सोवियत संघ इनके विरुद्ध अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए वारसा पैक्ट नामक गठबंधन को तैयार किया। एक दूसरे के विरुद्ध अपनी शक्ति को बढ़ाने की यह प्रतिस्पर्धा अंततः शीत युद्ध का कारण बनी।
4- एक दूसरे के विरुद्ध प्रचार-प्रसार
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात दोनों शक्तिगुट एक दूसरे के विरुद्ध प्रचार प्रसार करने लगे सोवियत संघ का यह कहना था कि पूंजीवादी पश्चिमी देश साम्राज्यवादी एवं उपनिवेशवादी हैं। ये कमजोर एवं गरीब देशों का शोषण करने में विश्वास रखते हैं अतः इनके खिलाफ विद्रोह करके अपने देश में साम्यवादी शासन व्यवस्था की स्थापना करें जबकि अमेरिका का कहना था कि सोवियत संघ अपने साम्यवादी विचारों का प्रचार प्रसार पूरे विश्व में करके बलपूर्वक साम्यवादी शासन की स्थापना करना चाहता है। अतः इनसे (रेड फोबिया) बचने हेतु विश्व के अन्य देशों को भी अमेरिकी गुट में सम्मिलित होना चाहिए ।
5-मार्शल एवं ट्रूमैन योजना
ट्रूमैन योजना का संबंध ऐसे कूटनीतिक विचारों से है जिसके माध्यम से सोवियत संघ के प्रसार को रोका जाए। जबकि मार्शल योजना का संबंध यूरोप का पुनर्निर्माण में आर्थिक सहायता करके उन्हें अमेरिकी गुट में शामिल करना, जिससे कि साम्यवादी सोवियत संघ का विस्तार ना हो सके। जब सोवियत संघ को अमेरिका की इन नीतियों का पता चला वह भी इसी तरह का प्रयास करने लगा जिससे शीत युद्ध को बढ़ावा मिला।
6-सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का उल्लंघन
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात 1945 में याल्टा में एक समझौता हुआ था जिसके तहत पूर्वी यूरोप में सोवियत संघ के प्रभाव को तथा पश्चिमी यूरोप में अमेरिका के प्रभाव को स्वीकार किया गया था। लेकिन यह भी कहा गया कि इन देशों में लोकतांत्रिक सरकार का गठन किया जाएगा। परंतु सोवियत संघ ने पोलैंड में साम्यवादी सरकार की स्थापना कर दी जिससे अमेरिका नाराज हो गया।
7-शक्ति शून्यता का सिद्धांत
इस सिद्धांत के अनुसार द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात ब्रिटेन की शक्ति कमजोर होने के कारण जैसे-जैसे अपने उपनिवेशों से अपनी शक्ति को समेट रहा था वैसे वैसे इस शक्ति शून्यता को भरने के लिए अमेरिका को आगे बढ़ना चाहिए। जब सोवियत संघ को अमेरिका की इस नीति का पता चला तो वह भी अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए प्रयास करने लगा जो शीत युद्ध का कारण बना।
8-सुरक्षा परिषद में बार-बार वीटो का प्रयोग
सुरक्षा परिषद में जब भी कोई प्रस्ताव अमेरिकी गुट द्वारा लाया जाता था तो सोवियत संघ द्वारा इसे वीटो कर दिया जाता था।इसी प्रकार जब सोवियत संघ द्वारा कोई प्रस्ताव आता था तो उसे अमेरिका वीटो कर देता था।अतः दोनो गुटों की इसी रस्साकशी ने शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।
तात्कालिक कारण
9-चर्चिल का फुल्टन भाषण
5 मार्च 1946 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने अमेरिका के फुल्टन शहर में भाषण के दौरान यह कहा कि 'हम एक फासीवादी शक्ति के स्थान पर दूसरी फासीवादी शक्ति(साम्यवादी सोवियत संघ) का समर्थन नहीं कर सकते, इसलिए सोवियत संघ के विरुद्ध एंग्लो-अमेरिकन गठबंधन बनाया जाए।' उपरोक्त कथन शीत युद्ध को प्रारंभ कर दिया।
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गुट निरपेक्षता का अर्थ बतलाते हुए, गुट निरपेक्ष आदोलन के विकास में सहायक तत्वों पर प्रकाश डालिए।
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात पूरे विश्व में साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद के विरोध में जन्मे आंदोलन से कई देश नवस्वतंत्र हुए। इन देशो के समक्ष अपने पुनर्निर्माण एवं विकास की चुनौती थी। अतः ये नव स्वतंत्र देश शांति पूर्वक अपना विकास करना चाहते थे। चूंकि उस समय पूरा विश्व गुटबंदी एवं शीत युद्ध के दौर से गुजर रहा था अतः अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए इन देशों ने गुटनिरपेक्षता की नीति अर्थात न तो अमेरिकी गुट में और न ही सोवियत संघ के गुट में सम्मिलित होने की नीति अपनाई। धीरे-धीरे तृतीय विश्व के देशों में इस नीति का इतना प्रचार-प्रसार हुआ कि इस नीति को अपनाने वाले देशों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। इस प्रकार गुटनिरपेक्षता की नीति ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। इसीलिए इसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन(NAM) कहा जाता है। इस आंदोलन के संस्थापक सदस्यों में भारतीय प्रधानमंत्री नेहरुजी, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो एवं इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो का विशेष योगदान है। गुटनिरपेक्षता का अर्थ महाशक्तियों के गुटों में शामिल न होना है।इसका अर्थ पृथकतावाद नही है।पृथकतावाद का अर्थ है अपने आपको अंतर्राष्ट्रीय मामलों से अलग रखना है जबकि गुटनिरपेक्षता की नीति पूरे विश्व मे शांति एवं स्थिरता बनाये रखने के लिए दोनों ही गुटों के बीच मध्यस्थता की सक्रिय भूमिका अदा करना है।गुटनिरपेक्षता तटस्थता भी नही है। क्योंकि तटस्थता किसी भी पक्ष से युद्ध मे शामिल न होने की नीति है। ये देश न तो युद्ध को समाप्त करने के लिए प्रयासरत रहते हैं और न ही सही-गलत पर अपना कोई पक्ष रखते हैं अर्थात ये पूरी तरह से तटस्थ रहते हैं।जबकि गुटनिरपेक्ष देश सही-गलत पर अपने तर्क भी रखते हैं और युद्ध को समाप्त करने के लिए प्रयास भी करते हैं।इसके अतिरिक्त तटस्थता केवल युद्ध काल की नीति है जबकि गुटनिरपेक्षता की नीति युद्धकाल एवं शांतिकाल दोनों में जीवित रहती हैं।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के विकास में प्रेरक तत्व-
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के विकास में निम्नलिखित प्रेरक तत्वों का विशेष योगदान है-
1-शीत युद्ध का भय
सभी नवस्वतंत्र देश वर्षों तक गुलामी और शोषण का शिकार रहे। अतः स्वतंत्रता के पश्चात वे शांतिपूर्ण विकास करना चाहते थे ।यदि वे गुटबंदी का समर्थन करते तो ऐसी स्थिति में शीत युद्ध का प्रभाव इन देशों तक पहुंच सकता था। अतः इससे बचने के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई।
2-आर्थिक एवं तकनीकी सहायता की आवश्यकता
नवस्वतंत्र देशों को अपने पुनर्निर्माण एवं विकास के लिए आर्थिक एवं तकनीकी सहायता की आवश्यकता थी। यदि वे किसी एक गुट में सम्मिलित हो जाते तो दूसरे गुट द्वारा प्राप्त होने वाली इसी प्रकार की सहायता से वंचित हो जाते। अतः दोनों ही गुटों से सहायता प्राप्त करने के विकल्पों को खुला रखने के लिए उन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई ।
3-स्वतंत्र विदेश नीति की आकांक्षा
नवोदित स्वतंत्र राष्ट्र वर्षो की गुलामी से स्वतंत्र होने के पश्चात पुनः इसी प्रकार की किसी और गुलामी को स्वीकार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने यह निर्णय लिया कि किसी भी गुट में शामिल ना हो कर स्वतंत्रता पूर्वक अपनी विदेश नीति का निर्माण करें।
4-शक्ति राजनीति से पृथक रखकर स्वतंत्र अस्तित्व की आकांक्षा
नवस्वतंत्र देश इतने शक्तिशाली नहीं थे कि वे शक्ति राजनीति से पृथक रहते हुए भी विश्व को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। अतः गुटनिरपेक्ष आंदोलन उनके लिए एक ऐसा मंच था जिसके माध्यम से वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी सक्रिय भागीदारी को प्रस्तुत कर सकते थे।
5-साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद के प्रति आक्रोश
क्योंकि सभी गुटनिरपेक्ष देश साम्राज्यवादी उपनिवेशवादी ताकतों के शोषण का शिकार रहे थे अतः स्वतंत्रता के पश्चात एकजुट होकर उन राष्ट्रों को स्वतंत्र कराने के लिए प्रयास करने लगे जो अभी भी इसी प्रकार के शोषण के शिकार थे।अतः इनके माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले देशों का गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होना स्वाभाविक था। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष देशों की संख्या बढ़ती चली गई।
6-शांति की प्रबल इच्छा
नवस्वतंत्र देश शांति पूर्वक विकास करना चाहते थे अतः इनके लिए जरूरी था कि वे सैनिक गुटबंदी में न पढ़कर एकजुट होकर शीत युद्ध को समाप्त करने हेतु प्रयास करें।अतः इन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनायी।
गुटनिरपेक्ष देशों के विशेषताएं
1- ये देश किसी भी सैनिक गुटबंदी में अपने आप को संलिप्त नहीं करते।
2- ऐसे देशों की विदेश नीति स्वतंत्र होती है अर्थात इन पर गुटबंदी के शिकार देशों का कोई प्रभाव नहीं होता।
3- ये देश विश्व शांति के समर्थक होते हैं तथा इसके लिए आवश्यक सभी जरूरी उपायों के लिए प्रयास करते हैं।
4 - इनकी विदेश नीति साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद विरोधी होती है अर्थात जिन देशों में साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद के विरोध में आंदोलन चलाया जा रहा है उन आंदोलनों का ये देश समर्थन करते हैं।
5 - यह देश नस्लवाद या प्रजातिवाद का विरोध करते हैं तथा जिन देशों में नस्लवाद विरोधी आंदोलन चल रहे हैं उनका समर्थन करते हैं जैसे दक्षिण अफ्रीका में इसी प्रकार का आंदोलन हो रहा था।
6- ये देश अपने भूभाग को सैनिक अड्डा बनाने हेतु किसी भी गुटबंदी में शामिल देश को नहीं देते हैं।
7- ये देश शस्त्र नियंत्रण एवं निःशस्त्रीकरण का समर्थन करते हैं।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका
गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की केंद्रीय भूमिका रही है। यदि भारत को इस आंदोलन का जन्मदाता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि 1947 में नई दिल्ली में आयोजित किए गए एशियाई सम्मेलन में सर्वप्रथम नेहरु जी ने यह कहा था कि- "हम किसी देश के उपग्रह बनकर नहीं रहेंगे, हमारी विदेश नीति स्वतंत्र होगी।" नेहरू जी के इस विचार से अन्य देश भी प्रभावित हुए जिससे इस विचार को बल मिला और 1955 में आयोजित बांडुंग सम्मेलन में नेहरू जी युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर के साथ मिलकर संयुक्त वक्तव्य जारी किया। इसे ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन का आधार स्तंभ माना गया। इस प्रकार भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक देश है।
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गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वर्तमान में भारत के लिए क्या प्रासंगिकता है? स्पष्ट कीजिए
जब गुटनिरपेक्ष देशों का 18 वां शिखर सम्मेलन अक्टूबर 2019 में अजरबेजान की राजधानी बाकू में चल रहा था तो बुद्धिजीवियों की उस पर नजर लाजमी था। बुद्धिजीवियों में इस बात पर चर्चा होती रहती है कि अब जब गुटबंदी का दौर समाप्त हो गया तो फिर आज के परिपेक्ष में इसकी क्या आवश्यकता है? आइए जानते हैं क्या है भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति और वर्तमान में इसकी क्या प्रासंगिकता है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरा विश्व शीत युद्ध और गुटबंदी के दौर से गुजर रहा था तब नव स्वतंत्र भारत के सम्मुख अपनी स्वतंत्र विदेश स्थापित करने की चुनौती थी। चूंकि भारत शांति पूर्वक अपना नवनिर्माण व विकास करना चाहता था तथा इसके लिए दोनों ही गुटों से आर्थिक व तकनीकी सहायता की आवश्यकता थी इसलिए भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया। यदि हम किसी एक गुट में शामिल होते तो हमारी विदेश नीति स्वतंत्र नहीं रह पाती (जैसा कि नेहरू जी का कहना था कि हम किसी देश के उपग्रह नहीं बनना चाहते) तथा भारत की शांतिपूर्ण विकास की इच्छा शीत युद्ध की भेट चढ़ जाती और आधी दुनिया से शत्रुता मोल लेकर उनसे आर्थिक व तकनीकी सहायता प्राप्त करने से वंचित रह जाते।लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब ये सवाल प्रायः पूछा जाता है कि क्या भारत को गुटनिरपेक्षता की नीति का त्याग करके अमेरिका की ओर रुख करना चाहिए? शायद मोदी सरकार भी इसी बात पर विचार कर रही है इसीलिए पिछले दो शिखर सम्मेलन में माननीय प्रधानमंत्री जी भाग लेने नहीं जा रहे हैं। भारत का प्रतिनिधित्व माननीय उपराष्ट्रपति कर रहे हैं। शायद मोदी सरकार यह भी विश्लेषण कर रही है कि भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी चीन का काउंटर पोल अमेरिका है अतः चीन को साधने के लिए अमेरिका से रिश्ते मजबूत करना भारत के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा। एक समय था जब अमेरिका भारत के विरूद्ध पाकिस्तान की मदद कर रहा था उस समय भी चीन के मुद्दे पर अमेरिका भारत का साथ दिया था। डोकलाम विवाद के समय भी अमेरिका भारत के साथ था। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि गुट निरपेक्ष आंदोलन गुटबंदी के विरोध में कम अमेरिका के विरोध में ज्यादा प्रखर था। अब जब अमेरिका से हमारे रिश्ते सुधार के दौर में हैं तो ऐसे में NAM का राग अलापना बेमानी होगी।
लेकिन कुछ विशेषज्ञों की राय है कि आज के बदले वैश्विक परिदृश्य में भी NAM की प्रासंगिकता बनी हुई है। इसके पक्ष में कई बिंदु हैं लेकिन तीन महत्वपूर्ण बिंदु निम्न हैं
1- पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को समाप्त करने तथा टेरर फंडिंग पर लगाम लगाने के लिए यह मंच महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
2- जब संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ था उस समय इसमें केवल 51 सदस्य थे, लेकिन आज सदस्यों की संख्या बढ़कर 193 हो गई। अतः इस वैश्विक संस्था का लोकतांत्रिक तरीके से पुनर्गठन होना चाहिए। सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए। अतः भारत की इस दावेदारी को मजबूत बनाने के लिए भारत की पहचान तीसरी दुनिया के नेतृत्वकर्ता के तौर पर बनी रहनी चाहिए।
3- भारत के लिए NAM इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विकसित देश विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अपनी नव उपनिवेशवादी नीतियों को विकासशील देशों पर थोपते रहते हैं इसलिए विकसित देशों पर दबाव बनाने के लिए तृतीय विश्व के देशों को एकजुट रहना होगा।
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नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
विश्व के विभिन्न देशों के बीच भारी आर्थिक विषमता हैं। एक तरफ जहां आर्थिक दृष्टि से बहुत अधिक संपन्न विकसित देश हैं तो वहीं दूसरी तरफ गरीबी,भुखमरी और बीमारी से ग्रसित अल्पविकसित देश। इसी आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए अल्पविकसित देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1960 के बाद एक अभियान चलाया गया,जिसमें यह मांग की गई कि अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं का पुनर्गठन इस प्रकार किया जाए कि जिससे अल्पविकसित देश अपनी गरीबी भुखमरी को दूर कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में विकास कर सकें।इस व्यवस्था में विकसित देशों को अल्पविकसित व विकासशील देशों को आर्थिक व तकनीकी सहायता प्रदान करना था। इसे ही नवीन अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का नाम दिया गया।
उत्तर-दक्षिण संवाद का क्या हैं?
अधिकतर विश्व के धनी देश उत्तर में हैं जबकि पिछड़े हुए या विकासशील देश बड़ी संख्या में दक्षिण में है। 1960 के बाद विकासशील देशों ने यह अभियान चलाया की विकसित देशों का यह दायित्व है कि वे अविकसित व विकासशील देशों को वित्तीय सहायता व नई प्रौद्योगिकी देकर सहयोग करें। 1973 में अल्जीयर्स (अल्जीरिया) में गुटनिरपेक्ष देशों का सम्मेलन हुआ जहां नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था लाने का प्रस्ताव पास किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस संदर्भ में ब्रांडट आयोग(पश्चिमी जर्मनी के पूर्व चांसलर विल्ली ब्रांडट की अध्यक्षता में) गठित किया गया। जिसकी सिफारिशों पर विस्तृत चर्चा हुई। इसी चर्चा को उत्तर दक्षिण संवाद करते हैं। खेद की बात यह है कि विकसित देशों के असहयोग के कारण इस अभियान को सफलता नहीं मिली।
सामूहिक आत्मनिर्भरता व दक्षिण-दक्षिण सहयोग का क्या अर्थ है?
नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के संदर्भ में 1960 के बाद जो उत्तर-दक्षिण संवाद चला उसे उत्तर के विकसित देशों के असहयोग के कारण सफलता नही मिल सकी ।अतः सन1980 के बाद विकासशील देशों ने यह अभियान चलाया कि वे परस्पर सहयोग से अपना विकास करें। इनके लिए 15 विकासशील देशों का गुट G-15 बना। भारत ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई।
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