अध्याय-2 : द्विध्रुवीयता का अंत
द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक ध्रुवीय विश्व में संक्रमण पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए। या
पूर्व सोवियत प्रणाली की सकारात्मक एवं नकारात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उसके विघटन के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् दो महा शक्तियों का उदय हुआ।प्रथम अमेरिका और दूसरी सोवियत संघ।दोनों के बीच शीत युद्ध और गुटबंदी का दौर प्रारम्भ हो गया।अमेरिकी नेतृत्व में NATO, SEATO, CENTO नामक गुट बने जबकि सोवियत संघ के नेतृत्व में वारसा पैक्ट नामक गुट बना।इस प्रकार पूरे विश्व मे शक्ति के दो ध्रुव या केंद्र बन गए।इसे ही द्वि-ध्रुवीयता कहते हैं।लेकिन 1991में सोवियत संघ के विघटन के साथ द्वि-ध्रुवीयता का अंत हो गया और पूरा विश्व एक ध्रुवीय हो गया।आइये जानते है सोवियत संघ की प्रणाली की क्या विशेषताएं थी और किन कारणों से इसका विघटन हो गया?
समाजवादी सोवियत गणराज्य (USSR) रूस में हुई 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया।
इस प्रणाली की प्रमुख सकारात्मक विशेषताएं निम्न थी -
1-पूंजीवाद की बुराइयों से दूर
पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग द्वारा विभिन्न प्रकार से गरीब वर्ग का शोषण होता है। अतः यह व्यवस्था पूंजीवाद की विरोधी थी।
2-समाजवादी आदर्शों के अनुकूल
यह व्यवस्था समाजवाद के आदर्शों और समतामूलक समाज की जरूरत से प्रेरित थी।
3-निजी सम्पत्ति की संस्था को अस्वीकार
यह व्यवस्था मानव इतिहास में निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त करने और समाज को समानता के सिद्धांत पर सचेत रुप से रचने की सबसे बड़ी कोशिश थी। ऐसा करने में सोवियत प्रणाली के निर्माताओं ने राज्य और पार्टी की संस्था को प्राथमिक महत्व दिया ।
4-एक दलीय राजनीतिक व्यवस्था
सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। इसमें किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिए जगह नहीं थी।अतः निर्णय निर्माण में समय नहीं लगता था।सरकार कठोर निर्णय लेने में सक्षम थी।
5-नियोजित अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में राज्य का नियंत्रण था।पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से अर्थव्यवस्था का संचालन होता था।
6-दूसरी दुनिया के देशों का नेता
दूसरेे विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के नियंत्रण में आ गए। सोवियत सेना ने इन्हें फासीवादी ताकतों के चंगुल से मुक्त कराया था अतः इन सभी देशों की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को सोवियत संघ की समाजवादी प्रणाली की तर्ज पर डाला गया। इन्हें ही समाजवादी खेमे के देश या दूसरी दुनिया कहा जाता है ।इस खेमे का नेता समाजवादी सोवियत संघ था।
7-विकसित अर्थव्यवस्था
दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ महाशक्ति के रूप में उभरा। अमेरिका को छोड़ दे तो सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था शेष विश्व की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित थी।
8-उन्नत संचार प्रणाली
सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी। सोवियत संघ के दूरदराज के इलाके भी आवागमन की व्यवस्थित और विशाल प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे।
9-उन्नत उपभोक्ता उद्योग
सोवियत संघ का घरेलू उपभोक्ता उद्योग भी बहुत उन्नत था। पिन से लेकर कार तक सभी चीजों का उत्पादन यहां होता था। हालांकि सोवियत संघ के उपभोक्ता उद्योग में बनने वाली वस्तुएं गुणवत्ता के लिहाज से पश्चिमी देशों के स्तर की नहीं थी।
10-जनता को न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी
सोवियत संघ की सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर लिया था। सरकार बुनियादी जरूरत की चीजें मसलन स्वास्थ्य, शिक्षा बच्चों की देखभाल तथा लोक कल्याण की अन्य चीजें रियायती दर पर मुहैया कराती थी। बेरोजगारी नहीं थी।
11-उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व
भूमि और अन्य उत्पादक के साधनों पर राज्य का स्वामित्व व नियंत्रण था।
सोवियत प्रणाली की नकारात्मक विशेषताएं जो विघटन का कारण बनी
1-नौकरशाही का प्रभुत्व
सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया। यह प्रणाली सत्तावादी होती गई और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।
2-लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी
लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होने के कारण लोग अपनी असहमति अक्सर चुटकुलों और कार्टूनों में व्यक्त करते थे ।
3-सुधारों की कोशिश बेकार
सोवियत संघ की अधिकांश संस्थाओं में सुधार की जरूरत थी। इस दिशा में जो भी प्रयास हुए निरर्थक साबित हुए।लोग मिखाईल गोर्बाचोव के सुधारों की धीमी गति से और भी असंतुष्ट थे
4-कम्युनिस्ट पार्टी का निरंकुश शासन
सोवियत संघ में एक दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था। इसलिए सोवियत संघ के नागरिक एक पार्टी के निरंकुश शासन से छुटकारा चाहते थे।
5-लोकमत की अनदेखी
जनता ने अपनी संस्कृति और बाकी मामलों की साज-संभाल अपने आप करने के लिए 15 गणराज्यों को आपस में मिलाकर सोवियत संघ बनाया था लेकिन पार्टी ने जनता की इस इच्छा को पहचानने से इंकार कर दिया ।
6-संघ पर केवल रूस का प्रभुत्व
हालांकि सोवियत संघ के नक्शे में रूस संघ के 15 ग्राम राज्यों में से एक था लेकिन वास्तव में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था। अन्य क्षेत्रों की जनता अक्सर उपेक्षित और दमित महसूस करती थी ।
7-हथियारों की होड़
हथियारों की होड़ में सोवियत संघ ने समय-समय पर अमेरिका को बराबर की टक्कर दी लेकिन उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। सोवियत संघ प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे मसलन परिवहन ऊर्जा के मामले में पश्चिमी देशों की तुलना में पीछे रह गया।
8-नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि सोवियत संघ अपने नागरिकों की राजनीतिक और आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका।जिससे नागरिकों में असंतोष भर गया।
9- अफगानिस्तान में हस्तक्षेप
सोवियत संघ ने 1979 में अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया । इससे सोवियत संघ की व्यवस्था और भी कमजोर हुई।
10-उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन कम होना
हालांकि सोवियत संघ में लोगों का पारिश्रमिक लगातार बढ़ा लेकिन उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के मामले में वह पश्चिम के देशों से बहुत पीछे छूट गया । इससे हर तरह की उपभोक्ता वस्तुओं की कमी हो गई। खाद्यान्न का आयात साल दर साल बढ़ता गया। 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में यह व्यवस्था लड़खड़ा रही थी और अंततः ठहर सी गई।
गोर्बाच्योव के सुधार को समझाइए
सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का अधिकांश भाग परमाणु हथियारों और सैन्य साज सामानों पर खर्च किया ।अपने संसाधनों का एक बड़ा भाग पूर्वी यूरोप के अपने पिछलग्गू देशों के विकास पर खर्च किए ताकि वे सोवियत संघ के नियंत्रण में बनी रहे । इससे सोवियत संघ पर गहरा आर्थिक दबाव पड़ा जिसका सोवियत व्यवस्था प्रबंधन नहीं कर सकी। इसी के साथ सोवियत संघ के आम नागरिकों को जब इस बात की जानकारी हुई कि उनका जीवन स्तर यूरोपीय देशों की तुलना में बहुत निम्न है तो लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से धक्का लगा। सोवियत संघ की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पूर्णरूप से गतिरुद्ध हो चुकी थी । सोवियत संघ पर कम्युनिस्ट पार्टी का 1917 से शासन था लेकिन यह पार्टी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं थी । प्रशासन में भ्रष्टाचार चरम पर था। व्यवस्था सुधारने की क्षमता शासन में नहीं रह गयी थी। देश की विशालता के बावजूद सत्ता केंद्रीकृत थी। इन सभी कारणों से आम जनता असंतुष्ट और अलग-थलग हो गई थी इससे भी बुरी बात यह था कि पार्टी के अधिकारियों को आम नागरिकों से ज्यादा विशेषाधिकार प्राप्त थे। इससे लोगों का सत्ता के प्रति मोहभंग हो गया और सरकार का जनाधार खिसकता चला गया ।
ग्लॉसनास्ट व पेरिस्ट्रोयका का क्या अर्थ है ?
मार्च 1985 में सोवियत संघ में गोर्बाच्योव राष्ट्रपति बने। गोर्बाच्योव ने इन समस्याओं के समाधान का जनता से वादा किया।उन्होंने अपनी नई सोच प्रस्तुत किया ।उन्होंने लोगों की स्वतंत्रता को बहाल किया तथा अर्थव्यवस्था का नव-निर्माण किया । ग्लॉसनास्ट का अर्थ है 'खुलेपन की नीति' और पेरिस्ट्रोयका का अर्थ है 'आर्थिक नव निर्माण' । इस प्रकार लेनिन के समय से चली आ रही वह व्यवस्था समाप्त हो गई जिसमें लोगों को मूकबधिर पशुओं की तरह बना दिया गया था उन्हें किसी भी प्रकार की आजादी नही थी। अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र को प्रवेश दिया गया।गोर्बाच्योव की दृष्टि में टूटते हुए समाजवादी राज्य को बचाने के लिए यही रास्ता सबसे उपयुक्त था। लेकिन गोर्बाच्योव के सुधार लागू होते ही लोगों को वाक-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली जिससे लोग सरकार की गलत नीतियों का खुलकर विरोध करने लगे। लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का ज्वार फूट पड़ा जो सोवियत समाजवादी व्यवस्था को बहा ले गया ।सोवियत संघ के घटक देशों में राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भाव का उदय हुआ जो धीरे-धीरे सोवियत संघ के विघटन का रास्ता तैयार कर दिया ।
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"पूर्व रूसी गणराज्यों में समाजवाद से पूंजीवाद में परिवर्तन आसान नहीं था।" इस कथन की विवेचना कीजिए। या
शॉक थेरेपी का अर्थ समझाते हुए उसके प्रभावों पर प्रकाश डालिए।
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात रूस, पूर्वी यूरोप व मध्य एशिया के देशों ने विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में आकर साम्यवाद से पूंजीवादी व्यवस्था में परिवर्तित होने का निर्णय लिया, जिसके लिए उन्होंने शॉक थेरेपी मॉडल का सहारा लिया । परंतु यह मार्ग आसान नहीं था, साम्यवादी व्यवस्था का लोकतांत्रिक पूंजीवादी व्यवस्था में यह संक्रमण कष्टप्रद मार्ग से गुजरा।आइये जानते हैं, क्या है शॉक थेरेपी और क्या हैं इसके दुष्परिणाम ?
शॉक थेरेपी का अर्थ
सोवियत संघ के पतन के बाद रूस, पूर्वी यूरोप व मध्य एशिया के देशों में साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर संक्रमण के लिए एक विशेष मॉडल को अपनाया गया जिसे शॉक थेरेपी (आघात पहुंचा कर उपचार करना) कहा जाता है। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMG) के द्वारा इस मॉडल को प्रस्तुत किया गया । शॉक थेरेपी में निजी स्वामित्व, राज्य संपदा के निजीकरण और व्यवसायिक स्वामित्व के ढांचे को अपनाना, पूंजीवादी पद्धति से कृषि करना तथा मुक्त व्यापार को पूर्ण रुप से अपनाना शामिल है। वित्तीय खुलेपन तथा मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता भी महत्वपूर्ण मानी गई।इसे ही एलपीजी अर्थात उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति भी कहा जाता है।भारत में भी इसका प्रभाव 1991के बाद देखा गया।1991में सोवियत संघ के पतन के बाद दूसरी दुनिया के देशों की व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन देखने को मिले।इस नई व्यवस्था को उत्तर-साम्यवादी व्यवस्था का नाम दिया गया।
उत्तर-साम्यवादी व्यवस्था की विशेषताएं-
1- राजनीति अर्थव्यवस्था व समाज के ऊपर साम्यवादी पार्टी के नियंत्रण का अंत हो गया।
2- बहुलवादी समाज का उदय हुआ।अब लोगों को अपने हितों की रक्षा करने या उनके संवर्धन करने की अनुमति मिल गयी।
3- आर्थिक प्रतिबंध हटने लगे जिससे बाजार खुला। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया। राज्य और बाजार परस्पर मित्र समझे जाने लगे।
4- नई संस्थाए स्थापित होने लगी ( जैसे - राजनीतिक दल व दबाव-हित समूह) जिन्होंने राजनीतिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।
5- खुले और निष्पक्ष चुनाव का होना संभव हो गया। इसीलिए गैर कम्युनिस्ट संगठन सत्ताधारी हो गए।
6- प्रेस व न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहाल हो गई।
7- राज्यों की गृह व विदेश नीतियों में अधिक बदलाव आया।
8- लोगों को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
शॉक थेरेपी के नकारात्मक परिणाम
शॉक थेरेपी के नकारात्मक प्रभाव निम्न हैं-
1-1990 में अपनाई गई शॉक थेरेपी लोगों को उपभोग के उस आनंदलोक तक नहीं ले जा सकी जिसका उनसे वादा किया गया था।
2- शॉक थेरेपी के कारण साम्यवादी देशों की अर्थव्यवस्था नष्ट हो गई ।
3- रूस में संपूर्ण औद्योगिक ढांचा नष्ट हो गया।
4- लगभग 90% उद्योगों को कंपनियों एवं निजी हाथों में भेज दिया गया इसे इतिहास की सबसे बड़ी गैराज सेल कहा गया।
5- शॉक थेरेपी के कारण रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में नौटकी ढंग से गिरावट आई ।
6-सामूहिक या सहकारी खेती की प्रणाली समाप्त होने से लोगों को दी जाने वाली खाद्य सुरक्षा भी समाप्त हो गई।
7- सरकारी मदद को बंद करने के कारण अधिकांश लोग गरीब हो गए।
8- माफिया वर्ग ने अधिकांश गतिविधियों को अपने नियंत्रण में ले लिया।
9- शॉक थेरेपी के कारण धनी एवं निर्धन वर्ग में आर्थिक असमानता बहुत बढ़ गई ।
10- शॉक थेरेपी के कारण इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई और गृह युद्ध जैसी स्थिति विद्यमान हो गई।
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शीत युद्ध काल में भारत सोवियत संघ के संबंधों पर प्रकाश डालिए।
भारत - सोवियत रूस संबंध
भारत और सोवियत रूस के संबंधों को इतिहास के आईने में देखा जाए तो यह पता चलता है कि प्रारंभ से ही रूस हमारा विश्वसनीय मित्र रहा है। इस मित्रता एवं सहयोग को चरणबद्ध तरीके से निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है-
भारत ने जब गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, तो अमेरिका ही नहीं बल्कि रूस भी, भारत की इस नीति पर संदेह करता था। अतः रूस में भारतीय राजदूत सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने रूसी राष्ट्रपति स्टालिन को गुटनिरपेक्षता की नीति को समझाने की कोशिश किए जिसमें वे सफल भी हुए। इसी समय जब कोरिया युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना 38 अंश अक्षांश के ऊपर बढ़ने लगी तो भारत ने अमेरिका की इस कार्यवाही का विरोध किया, जिससे रूस बहुत प्रभावित हुआ और भारत एवं रूस के मध्य सहयोगात्मक संबंधों की दिशा में सकारात्मक पहल प्रारंभ हो गई।
भारत की आर्थिक नीतियों में रूस का सहयोग स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण रूस से ही नकल किया गया था। द्वितीय योजना काल में भिलाई इस्पात संयंत्र एवं तृतीय योजना काल में बोकारो इस्पात संयंत्र की स्थापना रूस के सहयोग से ही की गई थी।
सन 1965 में जब भारत पाकिस्तान युद्ध चल रहा था, उस समय पहले तो रूस चुप्पी साधे रहा, लेकिन जब भारतीय सेना का इस्लामाबाद तक कब्जा हो गया, तब चीन ने भारत को धमकी दी कि यदि भारत अपने सैनिकों को पीछे नहीं लेता है तो चीन पाकिस्तान की तरफ से भारत पर आक्रमण कर देगा। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रूस ने चीन को कड़े शब्दों में फटकारते हुए कहा कि 'आग में घी डालने से बाज आए अन्यथा परिणाम भयंकर होंगे।' युद्ध की समाप्ति के पश्चात भारत और पाकिस्तान के मध्य ताशकंद समझौता(1966) कराने में रूस का ही योगदान है। हलाकि इस समझौते से भारत को कोई फायदा नहीं हुआ था।
जब सन 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के मुद्दे पर भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था, तो अमेरिका ने अपना सबसे शक्तिशाली सातवाँ समुद्री बेड़ा पाकिस्तान की मदद के लिए भेजा। जिससे सुरक्षा प्राप्त करने के लिए भारत ने कूटनीतिक पहल करते हुए रूप से 20 वर्षीय मैत्री समझौता किया। जिसका पता चलते ही अमेरिका सक्ते में आ गया और जब रूस ने अपने जंगी जहाजों का बेड़ा अरब सागर में भेज दिया, तो अमेरिका ने अपना बेड़ा वापस ले लिया।अतः भारत को पाकिस्तान से निपटना आसान हो गया।
कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका लगातार पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था।ऐसी स्थिति में यदि सोवियत रूस भारत का समर्थन नहीं किया होता तो शायद पूरा कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में चला गया होता।कश्मीर के मुद्दे पर रूस का एक कथन उल्लेखनीय है-
"कश्मीर मुद्दे पर यदि भारत हिमालय की चोटी से भी सहायता के लिए आवाज लगाता है तो रूस भारत की मदद के लिए दौड़ा दौड़ा चला आएगा।"
सन 1974 में भारत ने पोखरण-1 के तहत अपना पहला परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका नाराज हो गया। जिस पर रूस प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि जब पश्चिमी देश विकासशील देशों को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते तथा परमाणु शक्ति संपन्न देश अपना परमाणु निशस्त्रीकरण नहीं कर सकते तो उन्हें अन्य देशों पर इस प्रकार का प्रतिबंध लगाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इतना ही नही रूस ने भारत के परमाणु रिएक्टरों को चलाने हेतु कुछ हद तक यूरेनियम की सप्लाई भी की थी।
गोर्बाच्योव जब रूस के राष्ट्रपति बने, तो इनकी नीतियां उदारवादी थी। इनके कार्यकाल में आर्थिक सहयोग समझौता हुआ। जिसके तहत रूस ने भारत के टिहरी बांध परियोजना (उत्तराखंड), बोकारो इस्पात संयंत्र के प्रसार, झरिया कोयला उत्खनन एवं बंगाल की खाड़ी में तेल संभावनाओं का पता लगाने हेतु आवश्यक तकनीकी उपलब्ध कराने में सहयोग दिया।
लेकिन सोवियत संघ के विघटन के पश्चात भारत और रूस के संबंधों को पुनः स्थापित करने की चुनौती थी। जिसके लिए 1993 में पुनः एक संधि पर हस्ताक्षर किया गया। जिसके तहत रूस ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर भारत का समर्थन करने का आश्वासन दिया तथा दोनों देशों के मध्य सैन्य एवं तकनीकी सहयोग समझौता भी हुआ। इस समझौते में कुछ ऐसे प्रावधान भी थे, जिन्हें गुप्त रखा गया था। लेकिन जब भारत का रुझान अमेरिका की तरफ बढ़ने लगा तो भारत रूस संबंधों में थोड़ी शिथिलता आई।परन्तु 1998 में जब भारत ने पोखरण-2 के तहत 5 परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका नाराज होकर भारत पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि रूस ने इस प्रकार के प्रतिबंधों की निंदा की। इस प्रकार वर्तमान में भारत - चीन के मध्य उपजे तनाव के दौर में चीन की कड़ी आपत्तियों के बावजूद भी रूस ने दुनिया का सबसे ताकतवर एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम S-400 का समय पर डिलीवरी का आश्वासन दिया।
उपरोक्त घटनाओं से यह साबित हो गया है कि रूस ही ऐसा मित्र है जिसे समय की कसौटी पर खरा माना जा सकता है। इसीलिए तो भारत ने रूस को Time-Tested Friend की संज्ञा दी है।
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